आर्यभट्ट का ज़ीरो रिव्यू: हिमांश कोहली ने बदली अपनी इमेज, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले फिल्म को ले डूबा
आर्यभट्ट का ज़ीरो रिव्यू: हिमांश कोहली की मेहनत दिखती है, लेकिन कमजोर लेखन फिल्म को बार बार 'ज़ीरो' पर ला खड़ा करता है
रेटिंग: ⭐⭐☆☆☆ (2/5)
हर अच्छी सोच अच्छी फिल्म नहीं बनती
हर साल कुछ फिल्में एक नेक इरादे के साथ आती हैं। उनका मकसद मनोरंजन से ज्यादा प्रेरित करना होता है। 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' भी उसी इरादे के साथ आई है। फिल्म कहना चाहती है कि अगर इंसान खुद पर भरोसा करे तो जिंदगी बदल सकती है। अफसोस यह है कि जिस आत्मविश्वास का संदेश फिल्म देती है, वही आत्मविश्वास इसकी कहानी और स्क्रीनप्ले में नजर नहीं आता।
कहानी में दम है, लेकिन उसे सुनाने का तरीका थका देता है
कहानी ब्रह्मगुप्त श्रीवास्तव उर्फ बग्गू (हिमांश कोहली) की है। एक ऐसा लड़का जिसे परिवार, समाज और हालात बार बार नाकाम साबित करते हैं। वह अपनी पहचान तलाशने की कोशिश करता है और इसी सफर में जिंदगी उसे कई सबक सिखाती है।
समस्या कहानी नहीं है। समस्या यह है कि फिल्म बार बार वहीं रुक जाती है जहां उसे आगे बढ़ना चाहिए। कई दृश्य दोहराव का शिकार हैं और कई भावनात्मक पल बिना असर छोड़े गुजर जाते हैं। ऐसा लगता है जैसे फिल्म को अपने संदेश पर भरोसा था, लेकिन उसे सिनेमाई भाषा में बदलने की तैयारी अधूरी रह गई।
हिमांश कोहली फिल्म का सबसे मजबूत पक्ष हैं
अगर इस फिल्म के लिए सबसे ज्यादा तालियां किसी को मिलनी चाहिए तो वह हिमांश कोहली हैं। उन्होंने अपने करियर का शायद सबसे ईमानदार अभिनय किया है। छोटे शहर के हारे हुए लेकिन उम्मीद न छोड़ने वाले युवक की बेचैनी उनके चेहरे और बॉडी लैंग्वेज दोनों में दिखाई देती है।
नीरज सूद पिता के किरदार में भरोसा जगाते हैं। रवि किशन अपनी सहज मौजूदगी से फिल्म में थोड़ी जान डालते हैं। लेकिन राजेश शर्मा, अलका अमीन और शिल्पा शिंदे जैसे कलाकारों को जिस तरह सीमित कर दिया गया है, वह हैरान करता है। इतने अनुभवी कलाकार सिर्फ स्क्रीन भरने के लिए नहीं होने चाहिए थे।
डायरेक्शन में ईमानदारी है, लेकिन स्क्रीनप्ले बार बार धोखा देता है
निर्देशक कमल चंद्रा का इरादा साफ है और उनकी संवेदनशीलता भी दिखाई देती है। लेकिन एक फिल्म सिर्फ इरादों से नहीं चलती।
स्क्रीनप्ले कई जगह बिखरा हुआ लगता है। कुछ दृश्य कहानी को आगे बढ़ाने के बजाय उसकी रफ्तार रोक देते हैं। कई भावनात्मक हिस्से जरूरत से ज्यादा लंबे हैं और कुछ संवाद ऐसे लगते हैं जैसे दर्शकों को समझाने की कोशिश कर रहे हों, महसूस कराने की नहीं।
रियल लोकेशंस और ठीक ठाक सिनेमेटोग्राफी फिल्म को कुछ देर तक संभालते हैं, लेकिन ढीली एडिटिंग बार बार इसकी लय तोड़ देती है। अगर फिल्म 15 से 20 मिनट छोटी होती तो इसका असर कहीं ज्यादा बेहतर हो सकता था।
संगीत साथ चलता है, याद नहीं रहता
गाने कहानी में फिट बैठते हैं, लेकिन थिएटर से बाहर निकलने के बाद शायद ही कोई धुन आपके साथ जाए। बैकग्राउंड स्कोर भी ठीक है, लेकिन ऐसा कोई पल नहीं बनाता जो लंबे समय तक याद रह जाए।
फाइनल वर्डिक्ट
'आर्यभट्ट का ज़ीरो' एक ऐसी फिल्म है जो दिल से बनी हुई महसूस होती है, लेकिन दिमाग से उतनी मजबूत नहीं लिखी गई। हिमांश कोहली अपनी पूरी ईमानदारी के साथ फिल्म को संभालने की कोशिश करते हैं, लेकिन कमजोर स्क्रीनप्ले, असंतुलित रफ्तार और अधूरी सिनेमाई पकड़ उनकी मेहनत पर भारी पड़ जाती है।
यह फिल्म यह साबित जरूर करती है कि एक अच्छा संदेश जरूरी है, लेकिन सिर्फ संदेश के भरोसे अच्छी फिल्म नहीं बनती।
OnScreenBuzz Rating: ⭐⭐☆☆☆ (2/5)
पंचलाइन: हिमांश कोहली पास हो जाते हैं, लेकिन 'आर्यभट्ट का ज़ीरो' कहानी और स्क्रीनप्ले के पेपर में फेल हो जाती है।
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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