ONSCREENBUZZ
BUZZ

बंटवारा 1947 रिव्यू: बड़ा विषय, बड़े नाम… लेकिन कमजोर कहानी और बनावटी इमोशंस ने फिल्म को किया फीका

सनी देओल और शबाना आजमी जैसे मजबूत कलाकारों के बावजूद ‘बंटवारा 1947’ धीमी रफ्तार, जरूरत से ज्यादा ड्रामा और कम असरदार इमोशंस के कारण अपनी पूरी क्षमता तक नहीं पहुंच पाती।

✍️ By Rajni
• 📅 Aug 14, 2026 • ⏱️ 1 min read
बंटवारा 1947 रिव्यू: बड़ा विषय, बड़े नाम… लेकिन कमजोर कहानी और बनावटी इमोशंस ने फिल्म को किया फीका
Media Desk / OnscreenBuzz.com

SEO Title

बंटवारा 1947 रिव्यू: सनी देओल भी नहीं बचा पाए धीमी कहानी और ओवरड्रामैटिक ट्रीटमेंट, जानें क्यों मिले सिर्फ 2.5 स्टार

Meta Title

Meta Description




रेटिंग: ★★½☆ (2.5/5)

राजकुमार संतोषी और सनी देओल की जोड़ी का अपना एक सिनेमाई इतिहास है। घायल, दामिनी और घातक के बाद जब दोनों 1947 के बंटवारे जैसे संवेदनशील विषय पर लौटते हैं, तो उम्मीद होती है कि फिल्म भावनात्मक होने के साथ-साथ असरदार भी होगी। बंटवारा 1947 में विषय बड़ा है, कलाकार मजबूत हैं और कुछ दृश्य वाकई प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन फिल्म की सबसे बड़ी समस्या यही है कि वह अपने इमोशन को महसूस कराने के बजाय कई बार समझाने लगती है। नतीजा यह कि जिस दर्द को स्वाभाविक तरीके से दर्शक तक पहुंचना चाहिए था, वह कई जगह बनावटी और जरूरत से ज्यादा नाटकीय लगता है।

कहानी

कहानी बंटवारे के दौरान लाहौर पहुंचे सिकंदर मिर्जा (सनी देओल) और उनके परिवार के आसपास घूमती है। उन्हें एक ऐसा घर मिलता है जहां पहले से माई (शबाना आजमी) रहती हैं और वह अपना घर छोड़ने को तैयार नहीं हैं। एक तरफ सिकंदर का परिवार नए माहौल में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहा है, दूसरी तरफ माई अपने घर और उससे जुड़ी यादों को छोड़ने से इनकार करती हैं।

धीरे-धीरे सिकंदर और माई के बीच का रिश्ता बदलता है और फिल्म यहीं से धर्म, परिवार और इंसानियत की बात करने लगती है। विचार अच्छा है, लेकिन कहानी कई जगह बहुत सीधी चलती है और पटकथा में वह पकड़ नहीं है जो इतने बड़े विषय को चाहिए थी। कुछ घटनाएं आसानी से अनुमान में आ जाती हैं और फिल्म कई बार अपनी बात को जरूरत से ज्यादा दोहराती है।

एक्टिंग

सनी देओल और शबाना आजमी फिल्म को संभालने की सबसे बड़ी कोशिश करते हैं। सनी के व्यक्तित्व और आवाज में अब भी वह असर है, लेकिन कई दृश्यों में उनकी एक्टिंग जरूरत से ज्यादा लाउड और नाटकीय लगती है। शबाना आजमी ज्यादा सहज हैं और माई के किरदार में भावनात्मक वजन लेकर आती हैं। प्रीति जिंटा ठीक हैं, लेकिन उनके किरदार को और बेहतर तरीके से विकसित किया जा सकता था। करण देओल यहां कमजोर कड़ी साबित होते हैं। कई दृश्यों में संवाद और भावनाएं उतनी स्वाभाविक नहीं लगतीं और वह अपने किरदार की तीव्रता को पूरी तरह पकड़ नहीं पाते। बाकी सहायक किरदार भी कुछ जगह प्रभाव छोड़ते हैं, लेकिन कोई ऐसी परफॉर्मेंस नहीं है जो फिल्म की कमजोरियों को पूरी तरह ढक सके।

निर्देशन

राजकुमार संतोषी की फिल्म में उनका पुराना अंदाज साफ दिखाई देता है—लंबे संवाद, बड़े भावनात्मक टकराव और जोरदार ड्रामा। समस्या यह है कि आज के दर्शक के लिए यही तरीका कई जगह पुराना और खिंचा हुआ महसूस होता है। फिल्म धीमी है, खासकर कुछ हिस्सों में रफ्तार इतनी कम हो जाती है कि कहानी का असर टूटने लगता है।

सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि फिल्म के इमोशंस हमेशा ऑर्गेनिक नहीं लगते। कई दृश्यों में किरदार की स्थिति अपने आप भावुक करने के लिए काफी है, लेकिन निर्देशन उसे संवाद, बैकग्राउंड म्यूजिक और अतिरिक्त ड्रामा से और बड़ा बनाने की कोशिश करता है। अगर कुछ दृश्यों को छोटा किया जाता और इमोशन को थोड़ा सांस लेने दिया जाता, तो फिल्म कहीं ज्यादा असरदार बन सकती थी।

तकनीकी पक्ष

लाहौर का माहौल, घर, गलियां और भीड़ फिल्म को पीरियड का एहसास देने की कोशिश करते हैं। सिनेमैटोग्राफी ठीक-ठाक है, लेकिन कई जगह विजुअल्स में वह भव्यता नहीं दिखती जिसकी 1947 जैसे बड़े कैनवास वाली फिल्म से उम्मीद होती है। प्रोडक्शन डिजाइन में मेहनत नजर आती है, लेकिन इसे और बारीकी और विश्वसनीयता की जरूरत थी। ट्रेन और भीड़ वाले कुछ हिस्से बड़े पर्दे पर असर डालते हैं, मगर तकनीकी स्तर पर फिल्म लगातार एक जैसी मजबूत नहीं रहती।

म्यूजिक

संगीत कहानी के भावनात्मक हिस्सों को सपोर्ट करता है, लेकिन कई जगह बैकग्राउंड स्कोर इमोशन को और ज्यादा जोर देकर सामने लाता है। गाने कहानी के साथ चलते हैं, मगर ऐसा कोई ट्रैक नहीं है जो फिल्म खत्म होने के बाद लंबे समय तक याद रहे।

फाइनल वर्डिक्ट

बंटवारा 1947 का विषय मजबूत है और सनी देओल-शबाना आजमी जैसे कलाकार इसे कुछ हिस्सों में संभालते हैं। लेकिन धीमी रफ्तार, कमजोर पटकथा, जरूरत से ज्यादा लाउड ड्रामा और कई जगह बनावटी लगते इमोशंस फिल्म की सबसे बड़ी कमजोरियां हैं। करण देओल और कुछ सपोर्टिंग किरदार भी उस स्तर का असर नहीं छोड़ पाते जिसकी उनसे उम्मीद थी।

फिल्म इंसानियत की बात करना चाहती है, लेकिन उस संदेश तक पहुंचने का सफर जरूरत से ज्यादा लंबा और नाटकीय हो जाता है।

बड़ा विषय, अच्छे कलाकार और कुछ अच्छे पल—लेकिन बंटवारा 1947 एक यादगार फिल्म बनने के लिए जरूरी सिनेमाई पकड़ नहीं बना पाती।

रेटिंग: ★★½☆ (2.5/5)

Loved this story? Share with your friends!

Spread the word across your favorite social networks.

R

Rajni

Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.

🔥 Related Articles & Recommended Stories

More stories from Bollywood

View Section →
Kriti Sanon ने फिर छेड़ी वही बहस, ‘Was it my fault?’ पोस्ट ने मचाई हलचल; पुराने Ad विवाद के बाद अब किस बात पर दिया इशारा?
Bollywood 🇮🇳 Hindi

Kriti Sanon ने फिर छेड़ी वही बहस, ‘Was it my fault?’ पोस्ट ने मचाई हलचल; पुराने Ad विवाद के बाद अब किस बात पर दिया इशारा?

Kriti Sanon ने आज Instagram Story पर victim blaming को लेकर एक cryptic post शेयर किया है। यह पोस्ट उनके पुराने Raksha Bandhan ad विवाद के बाद सामने आया है, हालांकि अभिनेत्री ने किसी का नाम नहीं लिया।

📅 Sep 29
‘OTT और TV को सिनेमा से कम क्यों समझते हैं?’ Parineeti Chopra ने उठाया बड़ा सवाल, बोलीं- इन्हीं प्लेटफॉर्म्स ने इंडस्ट्री को बचाया था
Bollywood 🇮🇳 Hindi

‘OTT और TV को सिनेमा से कम क्यों समझते हैं?’ Parineeti Chopra ने उठाया बड़ा सवाल, बोलीं- इन्हीं प्लेटफॉर्म्स ने इंडस्ट्री को बचाया था

Parineeti Chopra ने OTT और TV को सिनेमा से कमतर समझने वाली सोच पर सवाल उठाया है। अभिनेत्री ने कहा कि महामारी के दौरान इन्हीं प्लेटफॉर्म्स ने इंडस्ट्री को संभालने में अहम भूमिका निभाई थी।

📅 Sep 29
Karan Johar के इस खास शख्स ने Kangana Ranaut पर दिया बड़ा बयान, बोले- ‘अब एक जोक बन गई हैं’; कभी थे बॉलीवुड के मशहूर फिल्म क्रिटिक
Bollywood 🇮🇳 Hindi

Karan Johar के इस खास शख्स ने Kangana Ranaut पर दिया बड़ा बयान, बोले- ‘अब एक जोक बन गई हैं’; कभी थे बॉलीवुड के मशहूर फिल्म क्रिटिक

राजीव मसंद ने कंगना रनौत के मौजूदा पब्लिक इमेज पर तीखी टिप्पणी की है। उन्होंने कहा कि उन्हें कंगना एक अभिनेत्री के तौर पर याद आती हैं और उनकी राजनीतिक पहचान ने एक्टिंग को पीछे छोड़ दिया है।

📅 Sep 29
गोविंदा पर भड़कीं दिव्या खोसला, सुनीता के सपोर्ट में लिखा लंबा नोट; बोलीं- ‘आप मेरी नजरों में अपनी इज्जत खो चुके हैं’
Bollywood 🇮🇳 Hindi

गोविंदा पर भड़कीं दिव्या खोसला, सुनीता के सपोर्ट में लिखा लंबा नोट; बोलीं- ‘आप मेरी नजरों में अपनी इज्जत खो चुके हैं’

गोविंदा और सुनीता आहूजा के रिश्ते को लेकर चल रही चर्चाओं के बीच दिव्या खोसला खुलकर सुनीता के सपोर्ट में उतर आई हैं। दिव्या ने गोविंदा से कई सवाल करते हुए कहा कि उन्होंने उनकी नजरों में अपना सम्मान खो दिया है।

📅 Sep 29