सुकमा की बेटियों की रैंप वॉक ने जीता दिल, अब फिल्मों में मिलेगा मौका? निर्देशक आकाशादित्य लामा की पहल का मंत्री गजेंद्र यादव ने किया स्वागत
सुकमा के पुनर्वास केंद्र की आत्मसमर्पित महिलाओं की रैंप वॉक ने सबका ध्यान खींचा। ‘बंगाल 1947’ के निर्देशक आकाशादित्य लामा ने उनके साथ फिल्म में काम करने की इच्छा जताई है, जिसका गजेंद्र यादव ने स्वागत किया।
रायपुर: राष्ट्रीय हथकरघा दिवस के मौके पर रायपुर में आयोजित छत्तीसगढ़ी हथकरघा परिधान फैशन शो में सुकमा के पुनर्वास केंद्र से आईं आत्मसमर्पित महिलाओं की रैंप वॉक ने लोगों का ध्यान खींचा। पारंपरिक छत्तीसगढ़ी परिधानों में आत्मविश्वास के साथ रैंप पर उतरीं इन महिलाओं की तस्वीर अब फैशन शो से आगे निकलती दिख रही है।
फिल्म ‘बंगाल 1947’ के निर्देशक और फिल्मकार आकाशादित्य लामा इन महिलाओं के आत्मविश्वास और उनकी कहानी से इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने भविष्य की अपनी फिल्मों में उनके साथ काम करने की इच्छा जताई है।
लामा की इस पहल का छत्तीसगढ़ के स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने स्वागत किया है। यादव का कहना है कि अगर सरकार के प्रयासों का सकारात्मक असर फिल्म और मनोरंजन इंडस्ट्री में भी दिखाई दे रहा है और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से मुख्यधारा में लौट रहे लोगों के लिए नए अवसर बन रहे हैं, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।
'यह सिर्फ रैंप वॉक नहीं, आत्मविश्वास की तस्वीर है'
सुकमा के पुनर्वास केंद्र से आईं पुनेम देवे, मिडियम गांगी, मड़वी देवे, मड़वी नंदिनी, मड़वी माले, पोड़ियाम राजे, दोद्दी रामे, मड़कम भीमे और पुनेम जोयत्ती ने जब छत्तीसगढ़ के पारंपरिक हथकरघा परिधानों में रैंप पर कदम रखा, तो यह सिर्फ एक फैशन शो का हिस्सा नहीं था।
आकाशादित्य लामा ने कहा कि इन महिलाओं की तस्वीरें और रैंप वॉक देखकर उन्हें बेहद खुशी हुई। छत्तीसगढ़ से अपने व्यक्तिगत जुड़ाव का जिक्र करते हुए उन्होंने बताया कि उनकी पढ़ाई-लिखाई भी छत्तीसगढ़ में हुई है और उन्होंने नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में शूटिंग का अनुभव भी लिया है।
लामा के मुताबिक, इन इलाकों को लेकर लंबे समय तक बाहर के लोगों के मन में डर की छवि रही। लेकिन आज उन्हीं क्षेत्रों की बेटियां आत्मविश्वास के साथ मंच पर खड़ी होकर अपनी संस्कृति, पहचान और पारंपरिक वेशभूषा को दुनिया के सामने पेश कर रही हैं।
उनके लिए यह बदलाव की तस्वीर है—जहां कभी डर था, वहां अब आत्मविश्वास दिखाई दे रहा है।
बस्तर की संस्कृति को दुनिया तक पहुंचाने की उम्मीद
लामा का मानना है कि किसी क्षेत्र में शांति आने का असर केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं रहता। जब बाहर से आने वाले लोग वहां जाने, काम करने और स्थानीय लोगों के साथ जुड़ने में सुरक्षित महसूस करने लगते हैं, तो उसके साथ आर्थिक गतिविधियों और विकास के रास्ते भी खुलते हैं।
उन्होंने देश के उन क्षेत्रों का उदाहरण दिया, जहां की लोक कला, स्थानीय व्यंजन और पारंपरिक परिधानों ने अंतरराष्ट्रीय पहचान बनाई है।
उनका मानना है कि अब बस्तर की संस्कृति, कला और पारंपरिक परिधानों को भी उसी तरह राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय मंच मिलना चाहिए।
'इनके साथ काम करना मेरे लिए सौभाग्य होगा'
आकाशादित्य लामा ने इन महिलाओं के साथ भविष्य की किसी फिल्म में काम करने की इच्छा भी जताई है।
उन्होंने बताया कि एक ऐसे ही विषय पर उनका काफी समय से काम चल रहा है। अगर प्रोजेक्ट आगे बढ़ता है और परिस्थितियां अनुकूल रहती हैं, तो इन महिलाओं के साथ काम करना उनके लिए सौभाग्य की बात होगी।
यह पहल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि सिनेमा और मनोरंजन जैसे बड़े मंच पर मिलने वाला अवसर इन महिलाओं को सिर्फ काम नहीं देगा, बल्कि उनकी कहानी और पहचान को भी देश के बड़े दर्शक वर्ग तक पहुंचा सकता है।
लामा ने अपनी फिल्म ‘बंगाल 1947’ की शूटिंग के दौरान नक्सल प्रभावित क्षेत्रों में काम करने का अनुभव भी साझा किया। उनका कहना है कि उन इलाकों को करीब से देखने के बाद वहां हो रहे बदलाव को समझना उनके लिए व्यक्तिगत तौर पर भी बेहद महत्वपूर्ण है।
गजेंद्र यादव बोले- 'इससे अच्छी बात और क्या होगी'
आकाशादित्य लामा की इस पहल पर स्कूल शिक्षा मंत्री गजेंद्र यादव ने सकारात्मक प्रतिक्रिया दी है।
यादव ने कहा कि अगर सरकार की ओर से किए जा रहे प्रयासों का असर इंडस्ट्री में सकारात्मक रूप से दिखाई दे रहा है और नक्सल प्रभावित क्षेत्रों से मुख्यधारा में लौट रहे लोगों के लिए नए अवसर बन रहे हैं, तो इससे अच्छी बात और क्या हो सकती है।
उनके मुताबिक, फिल्म, फैशन और कला जैसे क्षेत्र ऐसे लोगों को अपनी प्रतिभा दिखाने और समाज में अपनी नई पहचान बनाने का अवसर दे सकते हैं।
यह समर्थन इस लिहाज से भी अहम है कि मुख्यधारा में वापसी केवल रोजगार या पुनर्वास तक सीमित नहीं होती। समाज में सम्मान, पहचान और अवसर मिलना भी उस प्रक्रिया का महत्वपूर्ण हिस्सा है।
राजेश राणा बोले- 'आने वाले समय में भी होंगे बेहतर आयोजन'
इस आयोजन को लेकर खादी एवं ग्रामोद्योग विभाग के सचिव राजेश राणा ने भी सकारात्मक प्रतिक्रिया दी।
उन्होंने कहा, “यह आयोजन हमारे प्रेरणादायी रहा है, और इसकी चर्चा सब तरफ हो रही है। आने वाले समय में भी इस तरह के बेहतर आयोजन विभाग की तरफ से किए जाएंगे।”
राणा का बयान बताता है कि विभाग ऐसे आयोजनों को आगे भी जारी रखने की तैयारी में है, ताकि छत्तीसगढ़ के हथकरघा, स्थानीय परिधानों और संस्कृति को नए मंच मिल सकें।
रैंप से सिनेमा तक बदलती तस्वीर
रायपुर का यह फैशन शो इसलिए खास रहा क्योंकि यहां रैंप पर सिर्फ हथकरघा परिधान नहीं थे, बल्कि बदलते बस्तर और बदलते छत्तीसगढ़ की एक तस्वीर भी दिखाई दी।
सुकमा के पुनर्वास केंद्र से आईं इन महिलाओं ने जिस आत्मविश्वास के साथ मंच पर कदम रखा, वह उनके नए जीवन की कहानी कहता है।
अब अगर उन्हें फिल्म, फैशन, कला और मनोरंजन की दुनिया में भी अवसर मिलते हैं, तो यह बदलाव और व्यापक हो सकता है।
आकाश आदित्य लामा की पहल इसी दिशा में एक संभावित पहला कदम है। रैंप पर शुरू हुई यह कहानी अगर सिनेमा के पर्दे तक पहुंचती है, तो यह सिर्फ कुछ महिलाओं की कहानी नहीं होगी—बल्कि बस्तर के बदलते दौर और मुख्यधारा में लौटते लोगों के नए आत्मविश्वास की कहानी भी होगी।
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Rajni
Official editorial writer covering cinema box office, OTT streaming releases, Bollywood & Hollywood news, and pop culture for OnscreenBuzz.com.
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